
नई दिल्ली/वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के एक बड़े फैसले के बाद हार मानने के बजाय अपने तेवर और कड़े कर लिए हैं. कल सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा लगाए गए इमरजेंसी टैरिफ (Emergency Tariff) को अवैध करार दे दिया था. कोर्ट का कहना था कि राष्ट्रपति ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया है. इस फैसले से उन कंपनियों को बड़ी राहत मिली थी जो अरबों डॉलर का टैक्स भर रही थीं. लेकिन ट्रंप ने तुरंत पलटवार करते हुए नए ग्लोबल टैरिफ को 10% से बढ़ाकर 15% करने का फैसला किया है.।
ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वह अपनी ट्रेड पॉलिसी से पीछे नहीं हटेंगे. उन्होंने कहा कि वह ‘सेक्शन 122’ जैसी दूसरी कानूनी शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे. राष्ट्रपति का यह अड़ियल रवैया बता रहा है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और उसके व्यापारिक साझेदारों के बीच तनाव और बढ़ेगा. इस फैसले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल रिफंड को लेकर खड़ा हो गया है. कंपनियां अपने अरबों डॉलर वापस मांग रही हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन लंबी कानूनी लड़ाई की तैयारी में है।
1. सेक्शन 122 क्या है और ट्रंप इसे हथियार क्यों बना रहे हैं?
सुप्रीम कोर्ट के झटके के बाद ट्रंप ने अब ‘ट्रेड एक्ट 1974’ के सेक्शन 122 का सहारा लिया है. यह कानून राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वह गंभीर व्यापार घाटे को रोकने के लिए 15% तक का अस्थाई टैरिफ लगा सकते हैं. हालांकि, इसकी एक बड़ी सीमा है कि यह सिर्फ 150 दिनों के लिए ही प्रभावी रह सकता है. इसके बाद राष्ट्रपति को संसद यानी कांग्रेस से मंजूरी लेनी होगी.
ट्रंप का मानना है कि इससे उन्हें वह ताकत वापस मिल जाएगी जो कोर्ट ने उनसे छीनी है. उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जजों पर भी निशाना साधा और इसे देश के लिए एक बुरा फैसला बताया. एक्सपर्ट्स का कहना है कि ट्रंप इस कानून का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इसमें जांच की लंबी प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती. वह इसे तुरंत लागू करके अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को बरकरार रखना चाहते हैं।
2. इलिनोय के गवर्नर ने ट्रंप को 8.7 अरब डॉलर का बिल क्यों थमाया?
इस पूरे विवाद में अब राजनीति भी गर्मा गई है. इलिनोय के गवर्नर जेबी प्रित्ज़कर ने ट्रंप को एक औपचारिक इनवॉइस यानी बिल भेजा है. इसमें उन्होंने ट्रंप से 8.68 अरब डॉलर के रिफंड की मांग की है. गवर्नर का तर्क है कि ट्रंप के अवैध टैरिफ की वजह से उनके राज्य के हर परिवार को करीब 1700 डॉलर का नुकसान हुआ है. उन्होंने इसे ‘पास्ट ड्यू’ यानी बकाया राशि बताते हुए सोशल मीडिया पर लिखा।
हालांकि, कानूनी तौर पर यह मामला इतना सीधा नहीं है. टैरिफ का भुगतान कंपनियां करती हैं, आम जनता नहीं. कंपनियां इस बोझ को ग्राहकों पर डालती हैं जिससे महंगाई बढ़ती है. ऐसे में अगर रिफंड मिलता भी है, तो वह कंपनियों को मिलेगा न कि सीधे आम लोगों को. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वॉलमार्ट या कॉस्टको जैसी कंपनियां ग्राहकों को पुराना पैसा वापस नहीं करेंगी।
3. क्या रिफंड की जंग अगले 5 सालों तक खिंच सकती है?
रिफंड के मुद्दे पर ट्रंप ने जो बयान दिया है, उसने बिजनेस जगत की नींद उड़ा दी है. ट्रंप ने कहा, ‘मुझे लगता है कि इस पर अगले दो साल या शायद पांच साल तक मुकदमा चलेगा’. इसका मतलब है कि जिन कंपनियों ने पिछले साल अरबों डॉलर का टैक्स दिया है, उन्हें अपना पैसा वापस पाने के लिए कोर्ट के चक्कर काटने होंगे. ट्रंप प्रशासन ने पहले वादा किया था कि अगर कोर्ट का फैसला खिलाफ आया तो पैसा वापस कर दिया जाएगा।
अब प्रशासन अपने ही वादे से मुकरता दिख रहा है. हजारों कंपनियों ने पहले ही सरकार पर केस कर रखा है. अब इन मामलों की सुनवाई ‘कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड’ में होगी. छोटे व्यापारियों के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा खराब है, क्योंकि उनके पास लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए फंड नहीं है।
4. भारत और ग्लोबल मार्केट पर इस फैसले का क्या असर होगा?
भारत के लिए यह खबर मिली-जुली है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भारत पर लगे कुछ पुराने टैरिफ अवैध हो गए हैं. लेकिन ट्रंप के नए 10-15% ग्लोबल टैरिफ ने फिर से अनिश्चितता पैदा कर दी है. भारत का वाणिज्य मंत्रालय इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर रख रहा है. मंत्रालय ने कहा है कि वह कोर्ट के फैसले और ट्रंप के बयानों का एनालिसिस कर रहा है।
5. क्या बर्बाद होगा ग्लोबल मार्केट?
ट्रंप ने हिंट दिया है कि ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच वह तेल और अन्य चीजों पर दबाव बनाने के लिए मिलिट्री एक्शन भी ले सकते हैं. अगर ऐसा होता है, तो ग्लोबल सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा जाएगी. भारतीय निर्यातकों के लिए आने वाले 150 दिन बहुत चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं, क्योंकि ट्रंप की नई नीति किसी भी वक्त लागू हो सकती है।
