इस्लाम के 5 फर्ज में शामिल रोजा, जानिए किन कामों से रखना है तौबा

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रमजान का महीना शुरू होते ही माहौल बदल जाता है. मस्जिदों में रौनक बढ़ जाती है, घरों में इफ्तार की तैयारियां होने लगती हैं और दिलों में एक अजीब सी सुकूनभरी हलचल महसूस होती है. लेकिन क्या रोजा सिर्फ सुबह से शाम तक भूखे-प्यासे रहने का नाम है? बहुत से लोग इसे केवल उपवास समझ लेते हैं, जबकि हकीकत इससे कहीं गहरी है. रमजान आत्म-संयम, आत्म-चिंतन और खुद को बेहतर इंसान बनाने का महीना है.
 इस्लाम के पांच फर्ज़ों में से एक रोजा, दरअसल इंसान को उसके भीतर झांकने का मौका देता है. यह सिर्फ शरीर की भूख पर काबू नहीं, बल्कि नीयत, नजर, लफ्ज़ और व्यवहार की भी परीक्षा है. इसलिए रोजा रखने वाले हर शख्स के लिए यह समझना जरूरी है कि किन बातों से तौबा करना इस पवित्र महीने की असल रूह है.
 इस्लाम के पांच स्तंभों में रोजा की अहमियत इस्लाम की बुनियाद पांच स्तंभों पर टिकी है कलिमा, नमाज, रोजा, जकात और हज. इनमें रोजा तीसरा अहम स्तंभ माना गया है. रमजान के महीने में हर बालिग और सेहतमंद मुसलमान पर रोजा रखना फर्ज़ है.
 कुरान में रोजे को तक़वा यानी परहेज़गारी हासिल करने का जरिया बताया गया है. जब कोई इंसान दिनभर भूखा-प्यासा रहता है, तो उसे उन लोगों का दर्द समझ में आता है जो रोज भूख से जूझते हैं. यही वजह है कि रमजान में जकात और सदका देने पर भी खास जोर दिया जाता है. आज के दौर में, जब जिंदगी भागदौड़ से भरी है, रोजा इंसान को रुककर सोचने का मौका देता है. यह खुद से पूछने का वक्त है क्या हम सिर्फ पेट के लिए जी रहे हैं या रूह के लिए भी कुछ कर रहे हैं?
 रोजा का असली मतलब: सिर्फ भूख नहीं, बरताव भी अक्सर बच्चों को समझाया जाता है कि रोजा मतलब दिनभर कुछ न खाना-पीना. लेकिन बड़ों के लिए रोजा इससे कहीं आगे की चीज है.
 आंख, कान और जुबान का भी रोजा रोजा केवल पेट का नहीं, बल्कि आंख, कान और जुबान का भी होता है. यानी बुरी चीजें न देखना, गलत बातें न सुनना और किसी के बारे में गलत न बोलना. जरा सोचिए, अगर कोई शख्स दिनभर भूखा रहे लेकिन शाम को किसी की बुराई करे, झूठ बोले या किसी का दिल दुखाए तो क्या रोजा मुकम्मल हुआ? इस्लामी शिक्षाओं के मुताबिक, ऐसे रोजे की रूह कमज़ोर पड़ जाती है.
 झूठ, ग़ीबत और बदजुबानी से दूरी रमजान में झूठ बोलना, पीठ पीछे बुराई करना (ग़ीबत), झूठी गवाही देना या झूठी कसम खाना सख्त नापसंद किया गया है. रोजेदार से उम्मीद की जाती है कि वह अपने लफ्ज़ों पर खास ध्यान दे. आज सोशल मीडिया के दौर में यह और भी जरूरी हो गया है. फॉरवर्ड करने से पहले सोचें क्या यह खबर सही है? क्या इससे किसी की बदनामी तो नहीं होगी? डिजिटल दुनिया में भी जुबान की जिम्मेदारी कम नहीं होती.
 बुरी नीयत और शारीरिक संबंध से परहेज रोजा के दौरान सूर्योदय से सूर्यास्त तक शारीरिक संबंध बनाना मना है. साथ ही, बुरी नीयत या गलत सोच से भी बचने की हिदायत दी गई है. रोजा आत्म-संयम का अभ्यास है जिसमें इंसान अपने जज्बातों और इच्छाओं पर काबू करना सीखता है. यह एक तरह से खुद के साथ किया गया वादा है कि इस महीने हम अपने व्यवहार को बेहतर बनाएंगे.
 रमजान: बदलाव की शुरुआत हर साल रमजान आता है, लेकिन हर बार वह एक नया मौका लेकर आता है. कई लोग इसी महीने में धूम्रपान छोड़ने की कोशिश करते हैं, कुछ लोग गुस्से पर काबू पाना सीखते हैं, तो कुछ नमाज की पाबंदी शुरू करते हैं. असल मायनों में रोजा एक ट्रेनिंग है जो हमें सिखाती है कि अगर हम 30 दिन खुद को काबू में रख सकते हैं, तो आगे की जिंदगी में भी बेहतर इंसान बन सकते हैं.