क्या है चेतना की चौथी अवस्था? जब मन विस्तृत भी हो और सजग भी! श्री रवि शंकर ने समझाया ‘तुरीय अवस्था’ का विज्ञान

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प्रेम केवल भावना नहीं है, वह मन, हृदय, शरीर और हमारे आसपास के वातावरण को शुद्ध करने वाली शक्ति है. कहा जाता है कि ईश्वर को यदि किसी की आकांक्षा है, तो वह है – प्रेम. ईश्वर के पास सब कुछ है, फिर भी वे प्रेम के लिए आकुल हैं. मौन, संतोष और परिपूर्णता की अवस्था प्रेम की पराकाष्ठा है. यही गहरा ध्यान है.

घृणा से स्वयं का नुकसान
जब हम किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं, जिससे हम प्रेम करते हैं, तो भीतर स्वतः ही एक सुखद अनुभूति जाग उठती है. मन हल्का हो जाता है, शरीर में सहजता आ जाती है. इसके विपरीत, जब हम किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं, जिसे हम नापसंद करते हैं, तो भीतर कुछ सिकुड़ता हुआ-सा महसूस होता है. जैसे पूरी प्रणाली तनाव में आ गई हो. यह अनुभव बताता है कि हमारे विचार केवल हमारे मन को ही नहीं बल्कि वे हमारे पूरे अस्तित्व को प्रभावित करते हैं.
इसीलिए कहा गया है कि किसी से घृणा नहीं करनी चाहिए. यह सलाह नैतिकता के उपदेश से अधिक एक व्यावहारिक सत्य है. ऐसा नहीं है कि घृणा करने से हम दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुँचाते हैं, वास्तव में, घृणा का पहला और सबसे गहरा प्रभाव स्वयं हमारे ऊपर पड़ता है. जब हम किसी से घृणा करते हैं, तो हम अनजाने में ही उसके नकारात्मक गुणों को अपने भीतर ग्रहण करने लगते हैं.

राक्षसों ने कैसे पाई मुक्ति
पुराणों में एक प्रसिद्ध कथा आती है. भगवान विष्णु के धाम के द्वार पर खड़े रक्षकों ने कुछ संतों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया. संतों ने यह प्रश्न उठाया कि यदि ईश्वर सभी के सेवक हैं, तो विष्णु स्वयं संतों के सेवक हुए. ऐसे में द्वारपालों के आचरण के लिए उन्हें प्रायश्चित करना होगा. उनके सामने दो विकल्प रखे गए, या तो द्वारपाल सौ जन्मों तक अच्छे व्यक्ति के रूप में जन्म लें, या केवल तीन जन्मों तक अत्यंत दुष्ट व्यक्ति के रूप में. उन्होंने तीन जन्मों तक ईश्वर के शत्रु बनकर जन्म लेना स्वीकार किया. वे राक्षस रूप में जन्मे और ईश्वर से तीव्र घृणा करते रहे. किंतु इसी घृणा के माध्यम से वे ईश्वर में पूरी तरह लीन हो गए और अंततः उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई.

प्रेम स्वयं से आरंभ होता है
इस कथा का सार यही है कि जिस पर हमारा ध्यान टिकता है, उसी के गुण हमारे भीतर उतरने लगते हैं, चाहे वह प्रेम हो या घृणा. जब घृणा भी पूर्ण रूप से किसी एक दिशा में केंद्रित हो जाती है, तो वह अंततः उसी चेतना में विलीन हो जाती है. शास्त्र कहते हैं – किसी से घृणा मत करो, सबसे प्रेम करो.
लेकिन यह प्रेम किसी आदर्श वाक्य से शुरू नहीं होता, बल्कि स्वयं से आरंभ होता है. अपने भीतर प्रेम को अनुभव कीजिए. धीरे-धीरे आप पाएँगे कि लोगों के चेहरे, उनके रूप और पहचानें धूमिल होने लगती हैं और केवल प्रेम ही शेष रह जाता है.
दुखी होने पर चेतना सिकुड़ जाती
जब मन प्रेम या प्रसन्नता की अवस्था में होता है, तो चेतना का विस्तार होता है. और जब हम दुःखी होते हैं, तो चेतना सिकुड़ जाती है. मन का सिकुड़ना ही दुःख है और मन का विस्तार ही आनंद. लेकिन एक रोचक तथ्य यह है कि जब मन का विस्तार होता है, तो अक्सर सजगता कम हो जाती है. नींद में भी मन विस्तृत होता है, पर चेतना जाग्रत नहीं रहती. जब हम बहुत खुश होते हैं, तो मन हर जगह फैल जाता है, केंद्रित नहीं रहता. और जब हम दुःखी होते हैं, तो मन अत्यधिक केंद्रित तो होता है, लेकिन चेतना संकुचित हो जाती है. ऐसे में प्रश्न उठता है, क्या कोई ऐसी अवस्था है, जहां मन विस्तृत भी हो और सजग भी?
ध्यान से सजगता और एकाग्रता एक साथ
ध्यान इसी प्रश्न का उत्तर है. ध्यान वह विधि है, जिसके माध्यम से हम एक ही समय में सजग भी रहते हैं और केंद्रित भी. ध्यान से चेतना का विस्तार होता है. इसे शास्त्रों में चेतना की चौथी अवस्था कहा गया है – तुरीय अवस्था या शिव तत्त्व. विज्ञान भी इस अनुभव की पुष्टि करता है. मस्तिष्क में हर समय अरबों-खरबों न्यूरॉन सक्रिय रहते हैं, किंतु एक समय पर उनमें से कुछ ही क्रियाशील होते हैं. जब कुछ शांत होते हैं, तो दूसरे सक्रिय हो जाते हैं. यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. इसी कारण नियमित ध्यान आवश्यक है ताकि मस्तिष्क की सभी कोशिकाएँ प्रशिक्षित और जागरूक हो सकें.
ध्यान से पूरा तंत्र पोषित
जिस प्रकार किसी शहर को तब पूर्ण साक्षर कहा जाता है, जब वहां का हर व्यक्ति पढ़ना-लिखना जानता हो, उसी तरह हमारा शरीर भी एक शहर है. आज कुछ कोशिकाएँ जागती हैं, कल कुछ और. ध्यान के माध्यम से हम धीरे-धीरे पूरे तंत्र को पोषित करते हैं. इसमें समय लगता है, लेकिन जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तब जीवन में परमानंद सहज रूप से प्रकट होने लगता है. अंततः, जब यह समझ जीवन में उतर आती है, तो प्रेम साधना बन जाता है और साधना ही जीवन.