Swar And Vyanjan In Hindi / स्वर और व्यंजन – हिंदी वर्णमाला

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Swar And Vyanjan In Hindi

Swar And Vyanjan In Hindi / स्वर और व्यंजन – हिंदी वर्णमाला:

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हिंदी वर्णमाला की परिभाषा / Hindi Varnmala Ki Paribhasha

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Swar And Vyanjan In Hindi

वर्ण क्या होता है ? मनुष्य किसी वर्ण का उच्चारण करते समय जब हवा उसके फेफड़े से निकलती है। फिर यह हवा glottis, larynx जैसे अंगो से होकर गुजरती है और अंत में यह हवा मुँह में प्रवेश करती है। तब नाक, तालू, तालु, वायुकोशीय रिज, दांत, होंठ, जीभ जैसे विभिन्न अंगों की हलचल होती है तब जाकर उच्चारण होता है।

फिर इस उच्चारण ध्वनि को लिखकर किसी चिन्ह के रूप में बताए जाता है फिर यह चिन्ह का जब ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए उपयोग होता है उसे वर्ण कहते है।

जब जीभ और उसका पिछला भाग एक साथ आता है तब एक अलग वर्ण का उच्चारण होता है और जब जीभ और दांत एक दूसरे को छूते है तब अलग वर्ण का उच्चारण होता है।

वर्ण का कभी खंड और टुकड़े नहीं होते है। यह एक अखंड स्वरुप में रहते है।

उदाहरण: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, क, ख, आदि।

यह समस्त वर्णो की माला को ‘वर्णमाला’ कहा जाता है। हिंदी वर्णमाला में 45 वर्ण होते है। जिसमे 10 स्वर 35 व्यंजन होते है। लेखन के आधार पर 52 वर्ण होते हैं इसमें 13 स्वर , 35 व्यंजन तथा 4 संयुक्त व्यंजन होते है। यह हिंदी वर्णमाला को दो भागों में विभक्त किए गए है।

  1. स्वर
  2. व्यंजन

स्वर / Swar (Vowels) In Hindi

स्व शब्द का अर्थ उच्चारण करने या ध्वनि निकालने होता है। जब जीभ का मुख के अंदर किसी भी अन्य अंगो से स्पर्श न हो और मुखद्वारा ध्वनि बाहर आता है उसे ‘स्वर’ कहते है।

स्वर का स्वतंत्र उच्चारण होता है। मुखरता के दौरान वायुमार्ग बाधित नहीं होता है। ऐसा वर्ण जो गले में किसी भी अंग की सहायता के बिना उच्चारण किया जाता है वह स्वर होता है। हिंदी भाषा में कुल 10 स्वर होते है।

उच्चारण के आधार पर स्वर: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ आदि।

लेखन के आधार पर स्वर :- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:, ऋ आदि।

स्वर के भेद / Swar Ke Bhed In Hindi

उच्चारण के लिए लगने वाले समय के स्तर पर स्वर के तीन भेद होते है।

  1. ह्स्व स्वर
  2. दीर्घ स्वर
  3. प्लुत स्वर

1. ह्स्व स्वर

जिन स्वरों का उच्चारण करते वक्त समय कम से कम लगता है उसे ‘ह्स्व स्वर’ कहते है।

जैसे- अ, इ, उ, (ऋ) आदि।

2. दीर्घ स्वर

जिन स्वरों का उच्चारण करते वक्त समय अधिक लगता है उसे ‘दीर्घ स्वर’ कहते है।

जैसे- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, (ऑ) आदि।

3. प्लुत स्वर

जिन स्वरों का उच्चारण करते वक्त समय दीर्घ स्वर से भी अधिक लगता है उसे ‘प्लुत स्वर’ कहते है। इन स्वरों का उपयोग दूर से बुलाने के लिए किया जाता है।

जैसे- ओऽम, सुनोऽऽ आदि।

होठों की आकृति के आधार पर स्वरों के प्रकार

होठों की आकृति के आधार पर स्वरों के दो प्रकार होते है।

  1. अवृत्ताकर
  2. वृत्ताकर

1. अवृत्ताकर

जिन स्वरों के उच्चारण पर होंठ गोल (वृत्ताकर) न होकर फैले रहे उसे ‘अवृत्ताकर स्वर’ कहते है।

जैसे- अ, आ, इ, ई, ए, ऐ, आदि।

2. वृत्ताकर

जिन स्वरों के उच्चारण पर होंठ गोल (वृत्ताकर) होते है उसे ‘वृत्ताकर स्वर’ कहते है।

जैसे- उ, ऊ, ओ, औ, (ऑ) आदि।

स्वर संबंधी अन्य महत्वपूर्ण जानकारी

अनुनासिक स्वर (ँ):-

जिन स्वरों का उच्चारण नाक और मुँह से होता है उसे ‘अनुनासिक स्वर’ कहते है।

जैसे- गाँव, दाँत, आँगन, सँवार आदि।

यह स्वरों को लिखने के लिए स्वर के ऊपर अनुनासिकता के लिए चंद्रबिंदु (ँ) का उपयोग होता है।

परंतु स्वर की मात्रा शिरोरेखा पर लगकर यह चंद्रबिंदु के स्थान पर मात्र बिंदु (.) का उपयोग होता है।

जैसे- कहीं, नहीं, हैं आदि।

निरनुनासिक स्वर :-

जिन स्वरों का उच्चारण केवल मुँह से होता है उसे ‘निरनुनासिक स्वर’ कहते है।

जैसे- इधर, उधर, आप, अपना, घर आदि।

अनुस्वार ( ं) :-

यह एक स्वर के तुरंत बाद आने वाला व्यंजन है। अनुस्वार ध्वनि नाक से निकलती है।

जैसे- अंगूर, अंगद, कंकन आदि।

विसर्ग ( ः) :-

यह एक व्यंजन है। और अनुस्वार के तरह स्वर के बाद आता है। इसका उच्चारण ‘ह’ की तरह होता है। हिंदी भाषा में इसका उपयोग काम होता है। परंतु संस्कृत भाषा में इसका प्रयोग अधिक होता है।

जैसे- मनःकामना, पयःपान, अतः, स्वतः, दुःख आदि।

अनुस्वार और अनुनासिक में अन्तर क्या है ?

अनुनासिक स्वर के उच्चारण करते समय नाक से कम और मुँह से अधिक सांस निकलती है।

जैसे- गाँव, आँत, आँसू, चिड़ियाँ आदि।

परंतु अनुस्वार का उच्चारण करते समय नाक से अधिक और मुँह से कम सांस निकलती है।

जैसे- अंश, अंक, पंच, अंग आदि।

कुछ शब्द के तत्सम रूप में अनुस्वार लगता है और तद्भव रूप में अनुनासिक लगता है।

जैसे- अंगुष्ठ – अँगूठा, दंत – दाँत, आंत्र – आँत आदि।

स्वर की मात्राएँ / Swar Ki Matra

स्वर के बदले हुए स्वरुप को ‘मात्राएँ’ कहा जाता है।

अ = कम

आ = ा = काम

इ = ि =किसलय

ई = ी = खीर

उ = ु = गुलाब

ऊ = ू = भूल

ऋ = ृ = तृण

ए = े = केश

ऐ = ै = है

ओ = ो = चोर

औ = ौ = चौखट

Note :- अ स्वर की कोही मात्रा नहीं होती है।

व्यंजन / Vyanjan (Consonant) In Hindi

जिन वर्णों की उच्चारण करने के लिए स्वरों की सहायता लेनी की जरुरत पड़ती है उन वर्णों को ‘व्यंजन’ कहा जाता है। अर्थात जिन वर्णों का उच्चारण करते समय हवा रूकावट के साथ मुँह से बाहर निकलती है वह वर्ण व्यंजन होता है।

हिंदी भाषा के तहत हिंदी वर्णमाला में 33 व्यंजन होते है।

जैसे- क, ख, ग, च, छ, त, थ, द, भ, म आदि।

सभी व्यंजन के उच्चारण में ‘अ’ की ध्वनि छुपी होती है। ‘अ’ स्वर के बिना किसी भी तरह के व्यंजन का उच्चारण संभव नहीं होता है।

जैसे- क्+अ=क, ख्+अ=ख, प्+अ =प आदि।

व्यंजन के भेद / Vyanjan (Consonant) Ke Bhed In Hindi

व्यंजन के तीन प्रकार होते है।

  1. स्पर्श व्यंजन
  2. अंतःस्थ व्यंजन
  3. उष्म व्यंजन

1. स्पर्श व्यंजन

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय कण्ठ, तालु, मूर्द्धा, दन्त और ओष्ठ किसी भी अंगो से ‘स्पर्श’ होता है उसे स्पर्श व्यंजन कहा जाता है।

इन व्यंजनों को वर्गीय व्यंजन भी कहा जाता है। क्योकि इन्हे पांच वर्ग में वर्गकृत किया गए है।

यह कुल 25 व्यंजन का 5 समूह होता है।

1. क वर्ग :- क ख ग घ ङ = कण्ठ का स्पर्श

2. च वर्ग :- च छ ज झ ञ = तालु का स्पर्श

3. ट वर्ग :- ट ठ ड ढ ण (ड़, ढ़) = मूर्धा का स्पर्श

4. त वर्ग :- त थ द ध न = दाँतो का स्पर्श

5. प वर्ग :- प फ ब भ म = होठों का स्पर्श

2. अंतःस्थ व्यंजन

जिन वर्णों का उच्चारण भीतर होता है उसे अंतःस्थ व्यंजन कहा जाता है। उच्चारण करते समय जीभ मुँह के भीतर किसी भी अंगो को स्पर्श नहीं करती है। यह व्यंजन चार होते है।

जैसे- य, र, ल, व।

3. उष्म व्यंजन

उष्म यानि गर्म। जिन वर्णों का उच्चारण करते वक्त हवा मुँह के भीतर विभिन्न अंगों को टकराकर सांस में गर्मी पैदा करती है उसे ‘उष्म व्यंजन’ कहा जाता है। यह व्यंजन अंतःस्थ व्यंजन की तरह चार होते है।

जैसे- श, ष, स, ह।

व्यंजनों का उच्चारण स्थान के आधारपर वर्गीकरण

व्यंजनों का उच्चारण स्थान :- जब व्यंजन को बोलते समय हवा मुँह के भीतर विभन्न स्थान से टकराती है। अर्थात मुँह के भीतर विभिन्न स्थान से ध्वनि प्रकट होते है उसे उच्चारण स्थान कहा जाता है।

व्यंजनों का उच्चारण स्थान के आधारपर वर्गीकरण:

कंठ्य
(गले से)
क, ख, ग, घ, ङ
तालव्य
(कठोर तालु से)
च, छ, ज, झ, ञ, य, श
मूर्धन्य
(कठोर तालु के अगले भाग से)
ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, ष
दंत्य
(दाँतों से)
त, थ, द, ध, न
वर्त्सय
(दाँतों के मूल से)
स, ज, र, ल
ओष्ठय
(दोनों होंठों से)
प, फ, ब, भ, म
दंतौष्ठय
(निचले होंठ व ऊपरी दाँतों से)
व, फ
स्वर यंत्र से

श्वास के आधार पर व्यंजन के भेद

  1. अल्पप्राण
  2. महाप्राण

1. अल्पप्राण

जिन व्यंजनों के उच्चारण पर श्वास अल्प मात्रा में निकले उसे ‘अल्पप्राण’ कहते है। अर्थात जिन व्यंजनों के उच्चारण पर हवा कम मात्रा में निकले वह अल्पप्राण होता है।

जैसे- क, ग, ङ; ज, ञ; ट, ड, ण; त, द, न; प, ब, म,। और अन्तःस्थ व्यंजन भी (य, र, ल, व ) अल्पप्राण होते हैं।

2. महाप्राण

जिन व्यंजनों के उच्चारण पर श्वास अधिक मात्रा में निकले उसे ‘महाप्राण’ कहते है।

जैसे- ख, घ; छ, झ; ठ, ढ; थ, ध; फ, भ और श, ष, स, ह।

व्यंजन के अन्य भेद

संयुक्त व्यंजन

जो व्यंजन दो और दो से अधिक व्यंजनों से मिलकर बनते है उसे ‘संयुक्त व्यंजन’ कहते है। यह कुल चार व्यंजन है।

जैसे-

क्ष = क् + ष + अ = क्ष (रक्षक, भक्षक, क्षोभ, क्षय)

त्र = त् + र् + अ = त्र (पत्रिका, त्राण, सर्वत्र, त्रिकोण)

ज्ञ = ज् + ञ + अ = ज्ञ (सर्वज्ञ, ज्ञाता, विज्ञान, विज्ञापन)

श्र = श् + र् + अ = श्र (श्रीमती, श्रम, परिश्रम, श्रवण)

द्वित्व व्यंजन

जब व्यंजन अपने समान किसी व्यंजन से मिलकर बनता है उसे ‘द्वित्व व्यंजन’ कहते है। इन व्यंजन में पहला व्यंजन स्वर रहित और दूसरा स्वर सहित होता है।

जैसे-

क् + क = पक्का

च् + च = कच्चा

म् + म = चम्मच

त् + त = पत्ता

संयुक्ताक्षर

जब कोही स्वर रहित व्यंजन दूसरे स्वर सहित व्यंजन से मिलकर व्यंजन बनता है उसे ‘संयुक्ताक्षर’ कहते है।

जैसे-

क् + त = क्त = संयुक्त

स् + थ = स्थ = स्थान

स् + व = स्व = स्वाद

द् + ध = द्ध = शुद्ध

कम्पन के आधार पर व्यंजन के भेद

  1. घोष व्यंजन
  2. अघोष व्यंजन

1. घोष व्यंजन

जिन व्यंजनों के उच्चारण करते समय नाद का उपयोग होता है उसे ‘घोष व्यंजन’ कहते है। इन व्यंजनों में सभी स्वर अ से ओ तक होते है। यह कुल 20 व्यंजन होते है।

जैसे-

ग, घ, ङ
ज, झ, ञ
ड, ढ, ण
द, ध, न
ब, भ, म
य, र, ल, व, ह

2. अघोष व्यंजन

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय नाद की जगह श्वास का उपयोग होता है उसे ‘अघोष व्यंजन’ कहते है। यह कुल 13 व्यंजन होते है।

जैसे- क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स

व्यंजन संबंधी अन्य महत्वपूर्ण जानकारी

हलंत

जब व्यंजनों का उच्चारण स्वर रहित किए जाता तब उसे लिखते समय उसके नव्हे एक तिरछी (्) रेखा आती है उसे ‘हलंत’ कहा जाता है।

अर्थात जब व्यंजन वर्ण में स्वर वर्ण का बिलकुल प्रभाव नहीं होता है तब शब्द को हलंत लगता है।

जैसे-

क्+अ=क

ख्+अ=ख

प्+अ =प

ऊपर दिए उदाहरण में क्, ख्, प्, शब्दों को हलंत लगा है। क्योकि यह स्वर रहित व्यंजन है।

हिंदी भाषा के नए व्यंजन

हिंदी वर्णमाला में पांच नए व्यंजन को जोड़े गए है।

जैसे- क्ष, त्र, ज्ञ, ड़ और ढ़।

किन्तु यह पांच व्यंजनों में पहले तीन व्यंजन संयुक्त व्यंजन है।

जैसे- क्+ष =क्ष; त्+र=त्र; ज्+ञ=ज्ञ।

बाकि दो ड़ और ढ़ व्यंजन ड और ढ को निचे बिंदु लगाकर बनाए गए है।

Sawaal Jawaab

How many swar and vyanjan in hindi?

हिंदी वर्णमाला में 45 वर्ण होते है। जिसमे 10 स्वर 35 व्यंजन होते है। लेखन के आधार पर 52 वर्ण होते हैं इसमें 13 स्वर , 35 व्यंजन तथा 4 संयुक्त व्यंजन होते है।

how many vyanjan in hindi?

हिंदी भाषा के तहत हिंदी वर्णमाला में 33 व्यंजन होते है।

Hindi varnamala mein kitne akshar hote hain?

लेखन के आधार पर 52 वर्ण होते हैं इसमें 13 स्वर , 35 व्यंजन तथा 4 संयुक्त व्यंजन होते है।

Hindi mein swar kitne hote hain?

लेखन के आधार पर 52 वर्ण होते हैं इसमें 13 स्वर होते है।

swar kitne prakar ke hote hain?

लेखन के आधार पर 52 वर्ण होते हैं इसमें 13 स्वर होते है। उच्चारण के लिए लगने वाले समय के स्तर पर स्वर के तीन प्रकार होते है।
1.ह्स्व स्वर
2.दीर्घ स्वर
3.प्लुत स्वर

इस पोस्ट में हमने आपको बहुत से Swar And Vyanjan In Hindi के बारेमे बताया। हमारी इस पोस्ट द्वारा यह कोशिश है के आपको स्वर और व्यंजन – हिंदी वर्णमाला से अवगत किया जाए।

दोस्तो हम उम्मीद करते है के Swar And Vyanjan In Hindi / स्वर और व्यंजन – हिंदी वर्णमाला अच्छा लगा हो। हमारी यही कोशिश है के आपको स्वर और व्यंजन – हिंदी वर्णमाला के बारेमें अवगत किया जाए।

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